{नूवी राजस्थानी कहाणी} हरखियो चमगूंगो व्हैग्यौ !!

म्हैं हूं हरखू, मां बाप रो मोबी बेटो। म्हारौ जलम राजपुतानै रै बांगद्सर गाँव में 4 जुलाई, 1948 नैं धोळै दोफारै ढाई बज्यां व्हियौ। म्हारै जलम रौ उच्छब घणै लाडां-कोडां मनाईज्यौ। म्हैं जिण वगत मां री ओझरी में पळ रैयो हो उण वगत राठौड़ी राज खतम व्हैग्यौ हो नैं इण राजपुतानै रौ नूंवै जलम्यै देस में विलय हुयग्यौ। राठौड़ी राज रै जावण अर नूंवै आजाद देस रै बायरै बिचाळै मां री ओझरी में लटपटावै हो उण वगत म्हारै गांव में भी नूंवी आजादी अर नूंवै देस में भिलन रे हरख में ढोल धुराईजै हा। इण गांव में म्हैं सगळा सूं न्यारौ-निरवाळौ हो। म्हारो नाव जरुर हरखियो हो पण हरख म्हारे नेड़े आगे ई नी हो.
म्हनैं जलम री घूंटी किण पाई म्हनैं इण रौ हाल भी ज्ञान कोनी हो। म्हारै मांय गांव रा सगळा टाबरां सूं न्यारा संस्कार मतोमत ही फळै हा। म्हारा बापजी घणा सीधा-साधा नैं मैंणत-मजूरी कर नैं धाकौ धिकावै हा। म्हैं म्हारी मां नैं घणी बैळां पूछ्या करतो ‘‘मां म्हैं सगळा सूं न्यारौ-निरवाळौ क्यूं हूं ? अर म्हारा हाव-भाव नैं बोली-चाली न्यारा कींकर है? म्हैं जद भी म्हारी मां नैं ओ सवाल पूछतो, मां कोई पडूतर नीं देवंती अर आप री पूठ फोर लेंवती। म्हैं मां रै इण बरताव सूं मन ई मन में घणौ मोसीजतो। म्हारै सवाल रौ पडूतर किणी रै खनै नीं हो।
ु अेक दिन चाणचकै गेलै मांय दाई मां मिळगी, म्हैं उण रौ गेलौ रोक नैं म्हारै मन री बात उण रै सांमी परकासी। अेकरकी तो वा ओला लेंवती थकी टाळमटोळ करती रैयी, जद म्हैं उण नैं उण रै नैम-धरम री सौगन देय दी तो वा ढीली पड़गी अर मन री गांठा खोलण ढूकगी।
बा बोली! आज तूं म्हारै नैम-धरम री सौगन देय दी तो सुण मोटयार! म्हैं थनैं इस्सै राज री बात बताउं, पण थनैं छाती काठी राखणी पड़सी अर इण नैं विधी रो विधाण समझ’र केवटणो पड़सी। म्हैं कैयो दाई मां आप बतावौ तो खरी कै इस्सी कांई बात है? जिकी बरसां सूं म्हारै हिवड़ै में लाय लगाय राखी है अर मनड़ै मांय घणी उथळ-पुथळ मच्यौड़ी है!
तद सुण हरखा !! थारी मां रा चाल-चलण ठीक नीं हा, थारौ बापू काम में इत्तौ लैलीन रैंवतो कै उण नैं घर कांनी ध्यान देवण रौ वगत ईज नीं मिलतो। उण वगत गांव में आजादी रा हाका करणिया कैई जणा नित उगै गांव में आंवता रैंवता। म्हैं जिसी सुणी उण मुजब थारी मां अेक परदेसी रै माया-जाळ में फस्यौड़ी ही अर उण रै सागै खांवती-पींवती ही अर अेक दिन तो म्हैं म्हारी निजरां सूं इण नैं देखी तो म्हनैं आभौ फाटतो सो दीख्यौ अर इत्ती सरम आई कै कदास आ धरती माता फाट ज्यावै अर म्हैं इण में समा ज्यावूं!
म्हनैं देखतां ही वो परदेसी तो उठै सूं तेतीसा मनायग्यौ अर उण दिन पछै तो वो गांव में ईज नी दीख्यौ। थारी मां लाज-सरम सूं दोवड़ी व्हियौड़ी आंसूड़ा राळण लागगी। म्हारा पग काठा झाल लीना अर आप रौ दुखड़ौ सुणावती कैयो - काकीसा, वो परदेसी घणौ छळगारौ हो, म्हनैं भोळी-भाळी नैं किंया आप रै आंटै में फसाली म्हनैं लखाव ही नीं पड़यौ। अबार म्हारै पेट में उण री तीन मईनां री सैनाणी पळै। उण रै मन री मांयली पीड़ म्हनैं साफ दीखै ही, बा आगे बोली काकीसा! म्हारी जिसी कुळ-कळंकी नैं जीवण रौ कोई हक कोनी। इत्तो कैय नैं बा गांव रै जोहड़े कांनी व्हीर हुंवती कैयौ अबै जीवण में कोई भदरक कोनी। म्हैं इण जोहड़ा में डूब नैं म्हारै पाप नैं धोवूंला।
म्हैं उण रौ बूकियौ पकड़ नैं रोकी अर कैयो-अबै हुगी जिकी तो हुगी उण नैं तूं जाणी का म्हैं जाणी। उण आवण वाळै जीव नैं मार नैं पाप री भागी क्यूं बणै? म्हारै हिंवळास सूं बा थोड़ी संभळी अर मरण रौ मतो टाळ दियौ अर म्हनैं कैयो-काकीसा आप नैं म्हारी सोगन है जै इण बात नैं किणी रै आगे परकासी तो। म्हैं उण नैं भरोसो दियो जद वा मानी। इत्तो सुणतां ही हरखियो चमगूंगो सो व्हैग्यौ, दायी मां उण नैं घणौ ही हरखा, औ हरखा कैय नैं बतळायौ पण वो अेकदम मून धारली। वां दोवां नैं इण भांत देख नैं गांव रै टाडै उपर लोगां रौ मगरियो सो मंडग्यौ। हरैक रै मूंडै सूं फगत अेक ही बोल नीसरै- हरखा , ओ हरखा , हरखा, ओ हरखू पण पाछौ कोई पडूतर नीं मिलै। पछै अेक टेर औरू सुणीजै! वा स्यात उण रै घर-परिवार अर कुटुम्ब-कड़ूम्बै आळां री ही। हरखिया रै .......... ओ हरखिया ....... हरखिया रै ................ ओ हरखिया ............... हरखिया रै -------------- हरखिया रै -----------.!
विनोद सारस्वत,
बीकानेर

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